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ट्रैफिक जाम से बर्बाद हो रहे 130 घंटे, 10 शहरों में रेंग रहे वाहन, देश का 1.47 लाख करोड़ का नुकसान

नई दिल्ली

आप जब ऑफिस, स्कूल या अन्य किसी काम से जाने के लिए घर से बाहर निकलते हैं तो मंजिल पर पहुंचने से पहले जाम में फंसना, उसे झेलना आपकी दिनचर्या में शुमार हो गया है. ये भारत के किसी एक शहर या व्यक्ति की समस्या नहीं है, बल्कि पूरे देश और उसकी 1.46 अरब आबादी की है.

इसी जाम की बदौलत आपका करीब 130 घंटा हर साल बर्बाद हो रहा है. ये हम नहीं बल्कि दुनिया के 492 शहरों के ट्रैफिक का अध्ययन करने वाली नीदरलैंड की कंपनी टॉमटॉम की एक रिपोर्ट कह रही है. बोस्ट ग्रुप की रिपोर्ट में देश को करीब 1.47 लाख करोड़ रुपए की हानि का भी उल्लेख किया गया है.

टॉमटॉम ट्रैफिक इंडेक्स में भारत के 10 शहरों की यातायात व्यवस्था के बारे में बताया गया है. जिसमें बेंगलुरु दुनिया में दूसरे नंबर पर है. यानी दुनिया का दूसरा सबसे धीमा शहर. जहां औसत यात्रा समय 3.37 मिनट प्रति किमी है. ETV Bharat Explainer में जानते हैं अन्य शहरों में क्या स्थिति है, जाम के क्या कारण हैं और निपटने के साधन क्या हैं?

खराब ट्रैफिक की टॉप-5 लिस्ट में भारत के 2 शहर: टॉमटॉम ट्रैफिक इंडेक्स 2025 के अनुसार, बेंगलुरु दुनिया के सबसे खराब ट्रैफिक जाम वाले शहरों में दूसरे नंबर पर है. मतलब कि बेंगलुरु गंभीर ट्रैफिक जाम की समस्या से जूझ रहा है.

इंडेक्स में सबसे ऊपर मेक्सिको सिटी है, आयरलैंड का डबलिन तीसरे स्थान पर है, जबकि पोलैंड का लॉड्ज चौथे स्थान पर है. पांचवें नंबर पर भारत का ही पुणे है. टॉप-5 में भारत के 2 शहरों का शामिल होना यह दर्शाता है कि शहरी विकास और निजी वाहनों पर निर्भरता ने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं.

ट्रैफिक मैनेजमेंट पहले से कठिन हुआ: टॉमटॉम ट्रैफिक इंडेक्स के अनुसार जैसे-जैसे शहर बढ़ते हैं और लोगों की ट्रैवलिंग बढ़ती है, नगर निगमों, नगर योजनाकारों और परिवहन अधिकारियों के सामने सड़क नेटवर्क के प्रबंधन की चुनौती बढ़ती जाती है. कंपनी ने माना है कि ट्रैफिक को ठीक से मैनेज करना पहले से कहीं अधिक कठिन हो गया है.

अमेरिका-जापान समेत कई देशों में यात्रा का समय बढ़ा: टॉमटॉम ट्रैफिक इंडेक्स के अनुसार लंदन (इंग्लैंड), बेंगलुरु (भारत), डबलिन (आयरलैंड), मेक्सिको सिटी (मेक्सिको), बार्सिलोना (स्पेन), एथेंस (ग्रीस), मिलान (इटली), रोसारियो (अर्जेंटीना), हिरोशिमा (जापान), सैन फ्रांसिस्को (संयुक्त राज्य अमेरिका) समेत कई अन्य प्रमुख शहरों में यात्रा का समय बढ़ गया. 2023 में बेंगलुरु छठा और 2024 में तीसरा सबसे अधिक भीड़भाड़ वाला शहर था.

एशिया का सबसे धीमा शहर बेंगलुरु: ट्रैफिक इंडेक्स के अनुसार एशिया में बेंगलुरु एक बार फिर सबसे धीमा शहर बन गया है. यहां औसत यात्रा समय 3 मिनट 37 सेकंड प्रति किलोमीटर है. हालांकि, सामान्य यातायात की स्थिति में यात्रा समय घटकर 2 मिनट 4 सेकंड रह जाता है.

भीड़भाड़ के स्तर के मामले में बेंगलुरु दुनिया का दूसरा सबसे भीड़भाड़ वाला शहर है, जिसका स्कोर 74.4 है, जो एक साल पहले 72.7 था. आयरलैंड का ऐतिहासिक शहर डबलिन 72.9 स्कोर के साथ तीसरे स्थान पर है. जो दुनिया का छठा सबसे धीमा शहर भी है, जहां प्रति किमी यात्रा का समय 3.27 मिनट है.

दक्षिण भारत के राज्यों में ट्रैफिक की स्थिति सबसे खराब: ट्रैफिक इंडेक्स ने भारत के 10 शहरों का सर्वे किया, जिसमें बेंगलुरु, पुणे, मुंबई, नई दिल्ली, कोलकाता, जयपुर, चेन्नई, हैदराबाद, एर्नाकुलम, अहमदाबाद शामिल हैं. इनमें 7 शहर भारत के दक्षिण से आते हैं. इस हिसाब से कहा जा सकता है कि दक्षिण के शहरों में ट्रैफिक व्यवस्था सबसे ज्यादा खराब है. 

छोटे शहरों में भी बढ़ी जाम की समस्या: मुंबई, नई दिल्ली और कोलकाता यह दिखाते हैं कि महानगर भी लगातार ट्रैफिक की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं. जयपुर, चेन्नई और हैदराबाद जैसे उभरते शहरों में भी ट्रैफिक जाम की समस्या बढ़ती जा रही है. यही नहीं एर्नाकुलम और अहमदाबाद जैसे छोटे शहर भी रैंकिंग में शामिल हैं, जो दर्शाता है कि ट्रैफिक की समस्या केवल महानगरों तक ही सीमित नहीं हैं.

बेंगलुरु में 10 किमी की दूरी 36 मिनट में हो रही पूरी: बेंगलुरु में ट्रैफिक की स्थिति ऐसी है कि लोग 15 मिनट में केवल 4.2 किलोमीटर की दूरी ही तय कर पाते हैं. यानी 10 किलोमीटर की दूरी तय करने में 36.09 मिनट का समय लग रहा है. जो 2024 की तुलना में 2 मिनट से अधिक है. व्यस्त समय में औसत गति घटकर 13.9 किमी/घंटा रह गई, जो पिछले वर्ष की तुलना में पूरे 1 किमी/घंटा धीमी है.

ये आंकड़े बेंगलुरु के सड़क नेटवर्क पर पड़ने वाले गंभीर दबाव को दर्शाते हैं. जहां व्यस्त समय में लगने वाला ट्रैफिक न केवल समय बर्बाद करता है, बल्कि ईंधन की खपत में कमी, प्रदूषण और यात्रियों के तनाव को भी बढ़ाता है. ये आंकड़े दुनिया के सबसे भीड़भाड़ वाले शहरों में मेट्रो विस्तार, कॉर्पोरेट कम्यूट, स्थायी परिवहन समाधानों की आवश्यकता पर जोर देते हैं.

ट्रैफिक जाम के कारण

    निजी वाहनों की बढ़ती संख्या: शहरी परिवारों में आमदनी बढ़ने से जीवन स्तर में सुधार हुआ है. आर्थिक समृद्धि ने लोगों को निजी वाहनों का मालिक बनने में सक्षम बनाया है, जिससे सड़क पर भीड़ बढ़ गई है.
    सड़कों का डिजाइन बढ़ा रहा जाम: सड़कों के रेडियल डिजाइन के कारण शहरों के केंद्रीय व्यावसायिक जिलों (सीबीडी) में और उसके आसपास ट्रैफिक जाम की समस्या ज्यादा हो गई है. लोगों को अक्सर सीबीडी से होकर गुजरना पड़ता है, जिसके चलते इन क्षेत्रों में भारी जाम लग जाता है.
    पार्किंग की समस्या: सड़क पर सीमित जगह होने के कारण किनारे पार्किंग बढ़ जाती है. अधिकांश शहरों में सड़क से अलग पार्किंग सुविधाएं, बहुमंजिला पार्किंग स्थल या विशेष पार्किंग क्षेत्र अपर्याप्त हैं. इससे व्यावसायिक क्षेत्रों में ट्रैफिक जाम की समस्या और भी गंभीर हो जाती है.
    ट्रैफिक नियामों की जानकारी का न होना: यातायात नियमों की जानकारी न होने के कारण भी सड़कों पर जाम की स्थिति बन जाती है.

ट्रैफिक जाम से निपटने के उपाय

    सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना: जब लोग सार्वजनिक बसों, ट्रेनों और मेट्रो का उपयोग करते हैं, तो सड़कों से निजी कारों की संख्या कम होती है. बेहतर सार्वजनिक परिवहन प्रणालियां मिलने पर लोग अपनी गाड़ियों के बजाय इन साधनों को चुनते हैं. कम किराए वाले सार्वजनिक वाहनों की बढ़ोतरी से सड़क पर भीड़ कम होगी.
    कार पूलिंग व्यवस्था: कार शेयरिंग सिस्टम से भी सड़कों पर भीड़ कम होती है. जैसे, एक स्थान से दूसरी समान जगह जाने वाले 5 लोग अगर अलग-अलग गाड़ी से जाएंगे तो सड़क पर भीड़ होगी, लेकिन जब ये एक ही गाड़ी से जाएंगे तो 4 वाहन सड़क पर कम उतरेंगे और भीड़ कम होगी.
    पुल-फ्लाईओवर, आधुनिक सिग्नल व्यवस्था: ट्रैफिक जाम को कम करने के लिए नई सड़कें, पुल और फ्लाईओवर बनाना कारगर तरीका है. आधुनिक ट्रैफिक सिग्नल व्यवस्था भी यातायात को बेहतर बनाते हैं. बाईपास और रिंग रोड भी शहर के अंदर के ट्रैफिक को कंट्रोल करने में कारगर होते हैं.
    यातायात जाम के कारण आर्थिक नुकसान: बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप की 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और कोलकाता को ट्रैफिक जाम के कारण ईंधन की बर्बादी और उत्पादकता में कमी से प्रति वर्ष करीब 1.47 लाख करोड़ का नुकसान होता है.

ट्रैफिक जाम से प्रदूषण: केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, प्रमुख शहरों में ट्रैफिक जाम से पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) में 30% तक की वृद्धि हो सकती है. इसके साथ ही पेट्रोल-डीजल की खपत में 20-40% की वृद्धि हो जाती है. क्योंकि रुके हुए वाहनों से निकलने वाला धुआं चल रहे वाहनों की तुलना में 3 से 7 गुना अधिक हो सकता है. गाड़ियों से नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂), कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) गैसें निकलती हैं. वाहन ट्रैफिक में फंस जाते हैं, तो रुक-रुक कर चलना सामान्य बात हो जाती है. इससे ईंधन की खपत बढ़ जाती है और हानिकारक गैसों का निकलना बढ़ जाता है.

    नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2) ये स्मॉग और एसिड रेल में योगदान देती हैं. फेफड़ों में जलन पैदा करती हैं और सांस संबंधी समस्याओं को बढ़ाती हैं.
    पार्टिकुलेट मैटर (PM) सूक्ष्म ठोस और तरल होते हैं जो हवा में तैरते रहते हैं. यातायात से टायर और ब्रेक के घिसाव से उत्पन्न होने वाले मोटे PM10 कण और धुएं के साथ निकलने वाले महीन PM2.5 कण फेफड़ों में चले जाते हैं.
    कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) गंधहीन, रंगहीन विषैला पदार्थ होता है जो ब्लड से जुड़ जाता है, जिससे शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है और भीड़भाड़ वाले या ट्रैफिक जाम वाले क्षेत्रों में गंभीर जोखिम पैदा कर सकते हैं.
    वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) अधूरे जले ईंधन और वाहनों के टेलपाइप से निकलती हैं. ये गैसें स्मॉग को बढ़ावा देती हैं और इनमें कैंसरकारक तत्व होते हैं जो गंभीर स्वास्थ्य प्रभावों से जुड़े होते हैं.

ट्रैफिक जाम में कितने घंटे फंस रहे लोग: टॉमटॉम ट्रैफिक इंडेक्स और सीएसई की रिपोर्ट के अनुसार, प्रमुख शहरों में यात्री प्रतिदिन 1.5 से 2 घंटे यातायात में फंसे रहते हैं. जो जागने के समय का 15% से अधिक हिस्सा है. रिपोर्ट के अनुसार, बेंगलुरु भारत में यातायात जाम में बर्बाद होने वाले समय के मामले में शीर्ष पर है, जहां लोगों को प्रतिवर्ष 168 घंटे का नुकसान होता है. 

पुणे दूसरे स्थान पर है, जहां लोग प्रति वर्ष 152 घंटे यातायात में फंसे रहते हैं. मुंबई 126 घंटे प्रति वर्ष के साथ तीसरे स्थान पर है, इसके बाद नई दिल्ली 104 घंटे और कोलकाता 150 घंटे के साथ तीसरे और तीसरे स्थान पर हैं.

कैसे काम करती है टॉमटॉम: करीब 15 साल से नीदरलैंड की कंपनी टॉमटॉम अपने डिजिटल मैप्स, नेविगेशन सॉफ्टवेयर और रियल-टाइम ट्रैफिक के जरिए दुनिया के अलग-अलग शहरों के ट्रैफिक का अध्ययन करती आ रही है. कंपनी हमारी सड़कों की स्थिति पर नजर रखकर पल-पल की गतिविधियों का विश्लेषण करती है. इसके आधार पर सालना ट्रैफिक इंडेक्स जारी करती है.

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