हजारों प्रमाण-पत्रों के बीच प्रतिमा ही निशाने पर क्यों? क्या तेजी से बढ़ता राजनीतिक कद बन रहा वजह?
कोर्ट के निर्देश पर चल रही प्रक्रिया, लेकिन क्षेत्र में चर्चा—क्या सिर्फ राज्यमंत्री को ही देनी पड़ रही है अग्निपरीक्षा?

सतना। प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री और रैगांव विधायक प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण-पत्र की जांच इन दिनों राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का विषय बनी हुई है। राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति द्वारा जांच प्रक्रिया आगे बढ़ाए जाने और गांव में मुनादी कराकर साक्ष्य आमंत्रित किए जाने के बाद क्षेत्र में कई तरह के सवाल उठने लगे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही पूछा जा रहा है कि यदि सतना, रैगांव, नागौद सहित प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में बागरी समाज के हजारों लोग वर्षों से अनुसूचित जाति प्रमाण-पत्र के आधार पर शासकीय योजनाओं और आरक्षण का लाभ लेते रहे हैं तो जांच की जद में केवल प्रतिमा बागरी का ही नाम क्यों आया? क्या यह महज एक कानूनी प्रक्रिया है या इसके पीछे राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता भी कोई भूमिका निभा रही है?
राजनीति में बढ़ते कद के साथ बढ़े सवाल
प्रतिमा बागरी का राजनीतिक सफर अपेक्षाकृत कम समय में तेजी से आगे बढ़ा है। रैगांव उपचुनाव से राजनीतिक पहचान बनाने वाली प्रतिमा बागरी को भाजपा ने वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में दोबारा मौका दिया और उन्होंने जीत दर्ज की। इसके बाद उन्हें प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री बनाया गया तथा महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी सौंपी गईं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सार्वजनिक जीवन में जैसे-जैसे किसी नेता का कद बढ़ता है, वैसे-वैसे उसके खिलाफ शिकायतें, आपत्तियां और कानूनी चुनौतियां भी बढ़ती हैं। ऐसे में प्रतिमा बागरी का मामला भी चर्चा के केंद्र में आ गया है।
कांग्रेस नेता की याचिका से शुरू हुआ विवाद
पूरा मामला तब सामने आया जब कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर प्रतिमा बागरी के अनुसूचित जाति प्रमाण-पत्र को चुनौती दी। याचिका में दावा किया गया कि संबंधित क्षेत्र में बागरी समुदाय की स्थिति को लेकर पुनः परीक्षण आवश्यक है। याचिका पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति को मामले की जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। इसके बाद से जांच की प्रक्रिया जारी है।
समर्थकों का सवाल—दशकों से मिल रहा लाभ, अब ही विवाद क्यों?
प्रतिमा बागरी के समर्थकों और क्षेत्र के कई लोगों का तर्क है कि बागरी समाज के अनेक परिवार वर्षों से इसी श्रेणी के प्रमाण-पत्रों के आधार पर विभिन्न सुविधाओं और आरक्षण का लाभ प्राप्त करते रहे हैं। उनका कहना है कि यदि किसी व्यवस्था या प्रक्रिया पर सवाल हैं, तो उसका परीक्षण व्यापक स्तर पर होना चाहिए, न कि केवल एक व्यक्ति तक सीमित रहना चाहिए। क्षेत्र में यह चर्चा भी सुनाई दे रही है कि प्रतिमा बागरी के परिवार के सदस्य भी लंबे समय से इसी श्रेणी के दस्तावेजों के आधार पर विभिन्न शासकीय प्रक्रियाओं का हिस्सा रहे हैं। ऐसे में केवल एक राजनीतिक रूप से सक्रिय व्यक्ति पर सवाल उठने से बहस और तेज हो गई है।
विरोधियों का तर्क—कानून सबके लिए समान
दूसरी ओर, मामले को उठाने वाले पक्ष का कहना है कि यह किसी व्यक्ति विशेष नहीं बल्कि प्रमाण-पत्र की वैधता से जुड़ा विषय है और इसकी जांच कानून के अनुसार होनी चाहिए। उनका तर्क है कि यदि कोई शिकायत की गई है तो उसकी निष्पक्ष जांच होना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है।
बेदाग छवि भी चर्चा का विषय
राजनीतिक गलियारों में एक चर्चा यह भी है कि प्रतिमा बागरी अब तक अपेक्षाकृत विवादों से दूर रही हैं। उनके विरोधी भी उन पर भ्रष्टाचार या व्यक्तिगत लाभ से जुड़े बड़े आरोप नहीं लगा पाए हैं। ऐसे में जाति प्रमाण-पत्र का मुद्दा अचानक सुर्खियों में आने के बाद लोग इसके राजनीतिक पहलुओं पर भी चर्चा कर रहे हैं।
6 जुलाई की सुनवाई पर टिकी निगाहें
अब सभी की नजर राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति के समक्ष होने वाली अगली सुनवाई पर है। दोनों पक्ष अपने-अपने दस्तावेज और तर्क प्रस्तुत करेंगे। जांच पूरी होने और सक्षम प्राधिकारी के अंतिम निर्णय के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि मामले की वास्तविक स्थिति क्या है। फिलहाल एक प्रश्न लगातार चर्चा में है—क्या यह केवल एक वैधानिक जांच है, या फिर प्रदेश की उभरती हुई महिला नेता के राजनीतिक कद से जुड़ा विवाद भी इसमें कहीं न कहीं भूमिका निभा रहा है? इसका जवाब आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट और कानूनी प्रक्रिया ही दे पाएगी।



